20 जुलाई 2010

लघुकथा

समझदारी /सुधा भार्गव

चचा -भतीजे अकसर फ़ोन पर बातें किया करते | आज भी उनका वार्तालाप चल रहा था |
--किसनिया ,तुम्हारे बाप की तबियत ठीक नहीं है |मेरी बूढ़ी शिराओं में भी इतनी ताकत नहीं बची कि उनके चार काम कर सकूँ |कुछ दिन के लिए यहाँ आकर सेवा का पुण्य कमा लो |

--चचा दो माह बाद गर्मियों की छुट्टियों में तो आना ही है |अभी आऊँ फिर दुबारा आऊँ कुछ जँचता नहीं | समय की भी बर्बादी और पैसे की भी |

--तुम्हारी समझ को क्या कहूँ ! बचकाना या बेमुरब्बत |पैसे की तो कोई कमी नहीं फिर बाप की जायदाद
भी तुम्हारे हाथों लगेगी |

--तभी तो मुझे और भी ज्यादा देखभाल के कदम उठाना है वरना दुनिया कहेगी - बाप की कमाई बेटा उड़ा रहा है |


* * * * *
-

1 टिप्पणी:

rajeev matwala ने कहा…

saarthk pryaas...achchhi soch ka parichy diya hai. meri shubhkamnaye....
Visi-www.rajeevmatwala.wordpress.com